Saturday, 27 February 2010

सारे बदन का खून पसीने मे जल गया

सारे बदन का खून पसीने मे जल गया
इतना चले के जिस्म हमारा पिघल गया
अच्छा हुआ जो राह मे ठोकर लगी हमे
हम गिर पड़े तो सारा ज़माना संभल गया ।
दहशत मे कोई साथ हमारा ना दे सका
दामन की फिक्र की तो गिरेबां निकल गया
चलते थे गिन रहे थे मुसीबत के रात दिन
दम लेने हम जो बैठ गए दम निकल गया।

हजारों ख्वाहिशे ऐसी
हजारों ख्वाहिशे ऐसी के हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमा लेकिन फ़िर भी कम निकले
डरे क्यों मेरा कातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खू जो चश्मे-तर* से उम्र भर यू दम-ब-दम निकले
निकलना खुल्द* से आदम का सुनते आए थे लेकिन
बड़े बे आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले
कोई लिखवाये ख़त गर उनको तो वो हमसे लिखवाए
हुए सुबह ओ घर से कान पर रखकर कलम निकले
ज़रा कर ज़ोर सीने पर के तीरे -पुर -सितम निकले
जो ये निकले तो दिल निकले जो दिल निकले तो दम निकले
मुहब्बत मे नही है फर्क जीने और मरने का
उसे को देखकर जीते है जिस काफिर पे दम निकले
खुदा के वास्ते पर्दा न काबे का उठा जालिम
कही ऐसा न हो यहाँ भी वही काफिर सनम निकले
कहाँ मैखाने का दरवाजा ग़ालिब और कहाँ वाइज*
पर इतना जानते है कल वो जाता था की हम निकले
चश्मे-तर-> नम आखें , खुल्द->स्वर्ग ,वाइज-> सूफी , सन्त

बेसन के सोंधी रोटी पर
बेसन के सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है चोका, बासन , चिमटा ,फुकनी जैसी माँ
बान की खुर्री खाट के उपर हर आहट पर कान धरे
आधी सोयी आधी जागी थकी दोपहरी जैसी माँ ॥
चिडियों की चेहकार मे गूंजे राधा मोहन अली अली
मुर्गे की आवाज़ से खुलती घर के कुण्डी जैसे माँ
याद आती है चोका, बासन..............................
बेटी ,बीबी बहन ,पडोसन थोडी थोडी सी सबमे
दिन भर इक रस्सी के ऊपर चलती नटनी जैसे माँ
बाँट के अपना चेहरा माथा ,आखे जाने कहाँ गयी ?
फटे पुराने एक अल्बम मे चंचल लडकी जैसी माँ
याद आती है चोका, बासन..............................

हमने अदब से हाथ बढाया सलाम को
हमने अदब से हाथ बढाया सलाम को
समझा उन्होंने इसमे है खतरा निजाम को
चोरी न करे , झूठ न बोले तो क्या करे?
चूल्हे पे क्या उसूल पकाएंगे शाम को।

कभी तो दर्ज होगी
कभी तो दर्ज होगी जुर्म की तहरीर थाने मे
कभी तो रोशनी होगी हमारे भी मकानो मे
कभी तो नाप लेंगे दूरियां इन आसमानो की
परिंदों का यकी कायम तो रहने दो उड़ानो मे ।
अजब है मायने इस दौर की गूंगी तरक्की के
मशीनी लोग ढाले जा रहे है कारखानों मे
कहे कैसे के अच्छे लोग मिलना हो गया मुश्किल
मिला करते है हीरे कोयले की ही खदानों मे
नज़रंदाज़ ये दुनिया करेगी कब तलक हमको
हमारा भी कभी तो जिक्र होगा दस्तानों मे




रहिये अब ऐसी जगह चलकर
रहिये अब ऐसी जगह चलकर
रहिये अब ऐसी जगह चलकर जहाँ कोई न हो
हमसफ़र कोई न हो और हमनवा कोई न हो
बे-दरो-दीवार सा एक घर बनाना चाहिए
कोई हमसाया न हो और पासबान* कोई न हो
पढिये गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार*
और गर मर जाये तो फ़िर नौखयार* कोई न हो
पासबान-> पहरेदार ,तीमारदार->खिदमत करने वाला
नौखयार-> रोने
वाला

बाज़ीचा -ऐ - अत्फाल
बाज़ीचा -ऐ - अत्फाल * है दुनिया मेरे आगे
होता है शबो -रोज़* तमाशा मेरे आगे
एक खेल है ओरंगे -सुलेमा मेरे नजदीक
एक बात है एजाज़ -ऐ -मसीहा मेरे आगे
मत पूछ के क्या हाल है मेरा तेरे पीछे
तू देख के क्या रंग है तेरा मेरे आगे
ईमान मुझे रोके है तो खीचे है मुझे कुफ्र*
काबा मेरे पीछे है कलीसा* मेरे आगे
होता है निहां* गर्द* मे सेहरा* मेरे आगे
घिसता है जाबी खाक पे दरिया मेरे आगे
जुज़* नाम नही सूरते आलम मुझे मंज़ूर
जुज़ वहम नही हस्ती- ऐ- आशियाँ मेरे आगे
गो हाथ को जुम्बिश* नही आखों मे तो दम है
रहने दो अभी सागरों* मीना* मेरे आगे
बाज़ीचा -ऐ - अत्फाल -बच्चों का खेल;
जुज़- सिर्फ़
शबो -रोज़-हर रोज़ (रात दिन);
कुफ्र-पाप ,गुनाह ;कलीसा-चर्च ;
निहां -गायब ; गर्द-धूल ;सेहरा-रेगिस्तान
जुम्बिश-हलचल; सागर-पैमाना ,शराब का गिलास ;
मीना -शराब

क्या बतलाऊ सुविधाओं मे कैसे कैसे जिंदा हूँ


क्या बतलाऊ सुविधाओं मे कैसे कैसे जिंदा हूँ
गुलदस्ते मे फूल सजाकर फूलों से शर्मिंदा हूँ
खुश होते है जब मिलते है , कौव्ली भी भर लेते है
मुड़ते ही जो आए ज़बा पर मे अपनी ही निंदा हू
इस माथे पर शिकने लाखों कुछ अपनी कुछ दुनिया की
जिसके दोनों और नदी हो उस तट का बाशिंदा हू
ये मत करना वो मत करना आहात हुआ नसीहत से
भूतकाल के आईने मे छुपा हुआ आइन्दा हू
गुलदस्ते मे फूल सजाकर फूलों से शर्मिंदा हूँ ......................

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